गुरुवार, 7 मई 2020

चुप्पियाँ-4


🌷📚

*चुप्पियाँ-4*

जो मैंने कहा नहीं,
जो मैंने लिखा नहीं,
उसकी समीक्षाएँ
पढ़कर तुष्ट हूँ,
अपनी चुप्पी की
बहुमुखी क्षमता पर
मंत्रमुग्ध हूँ...!

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

(1.9.18 रात्रि 11:37 बजे )

( कविता संग्रह *चुप्पियाँ* से।)

# घर में रहें। स्वस्थ रहें।
🙏🏻✍️

चुप्पियाँँ- 3



🌻📚
कुछ मित्रों का सुझाव था कि *चुप्पियाँ* शृंखला के अंतर्गत एक दिन एक ही कविता दूँ। उनके सुझाव को शिरोधार्य करते हुए आज से एक ही 
कविता साझा करूँगा।

*चुप्पियाँ- 3*

'मैं और
मेरी चुप्पी',
युग-युगांतर से
रच रहा हूँ
बस यही
एक महाकाव्य,
जाने क्या है कि
सर्ग समाप्त ही
नहीं होते...!

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com 

(1.9.18, रात 11:31 बजे)

#  घर में रहें, सुरक्षित रहें।

🙏🏻✍️

मंगलवार, 5 मई 2020

चुप्पियाँ- 1 और 2


🌷📚

पुनर्पाठ-

*चुप्पियाँ*

दस घंटे, चुप्पी और एक लघु कविता संग्रह का जन्म-
घटना 2018 की जन्माष्टमी की है। उस दिन मैंने लिखा,
"जन्माष्टमी का मंगल पर्व और माँ शारदा की अनुकंपा का दुग्ध-शर्करा योग आज जीवन में उतरा। कल रात लगभग 9 बजे 'चुप्पी' पर एक कविता ने जन्म लिया। फिर देर रात तक इसी विषय पर कुछ और कविताएँ भी जन्मीं। सुबह जगा तो इसी विषय की कविताओं के साथ। दोपहर तक कविताएँ निरंतर दस्तक देती रहीं, कागज़ पर जगह बनाती रहीं। रात के लगभग अढ़ाई घंटे और आज के सात, कुल जमा दस घंटे कह लीजिए सृजन के। इन दस घंटों में 'चुप्पी' पर चौंतीस कविताएँ अवतरित हुईं। इससे पहले भी अनेक बार कई कविताओं की एक साथ आमद होती रही है। एक ही विषय पर अनेक कविताएँ एक साथ भी आती रही हैं। अलबत्ता एक विषय पर एक साथ इतनी कविताएँ पहली बार जन्मीं। एक लघु कविता संग्रह ही तैयार हो गया। ज्ञानदेवी माँ सरस्वती और सर्वकलाओं के अधिष्ठाता योगेश्वर श्रीकृष्ण के प्रति नतमस्तक हूँ।"
'चुप्पियाँ' क्षितिज प्रकाशन के पास प्रकाशनार्थ है। लॉकडाउन खुलने के बाद संग्रह आएगा।
आज से प्रतिदिन इस विषय पर दो रचनाएँ साझा करूँगा।  समय निकाल कर  पढ़िए इन रचनाओं को और अपनी राय अवश्य दीजिए। 🙏🏻

*चुप्पियाँ-1*
वे निरंतर
कोंच रहे हैं मुझे,
......लिखो!
मैं चुप हो गया हूँ..,
अपनी सुविधा
में ढालकर,
मेरे लेखन की
शक्ल देकर,
अब बाज़ार में
चस्पा की जा रही है
मेरी चुप्पी..,
बाज़ार में मची धूम पर
क्या कहूँ दोस्तो,
मैं सचमुच चुप हूँ!

(1.9.18, रात 8.59 बजे)

*चुप्पियाँ -2*
मेरे भीतर जम रही हैं
चुप्पी की परतें,
मेरे भीतर बन रही है
एक मोटी-सी चादर,
मैं मुटा रहा हूँ...,
आलोचक इसे
खाल का मोटा होना
कह सकते हैं..,
कुछ अवसरसाधु
इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं,
मैं चुप हूँ, डरता हूँ
कहीं पिघल न जाए चुप्पी
इसके लावे की जद में
आ न जाएँ सारे आलोचक,
सारे अवसरसाधु,
विनाश की कीमत पर
सृजन नहीं चाहता मैं!
संजय भारद्वाज
(1.9.18, रात 9:56 बजे)

# घर में रहें। सुरक्षित रहें।
🙏🏻✍️

सोमवार, 4 मई 2020

पाखंड

*पाखंड*

बित्ता भर करता हूँ
गज भर बताता हूँ
नगण्य का अगणित करता हूँ
जब कभी मैं दाता होता हूँ..,
सूत्र उलट देता हूँ
बेशुमार हथियाता हूँ
कमी का रोना रोता हूँ
जब कभी मैं मँगता होता हूँ..,
धर्म, नैतिकता, सदाचार
सारा कुछ दुय्यम बना रहा
आदमी का मुखौटा जड़े  पाखंड
दुनिया में अव्वल बना रहा..!

संजय भारद्वाज
9890122603


# नियमों का पालन करें। स्वस्थ एवं सुरक्षित रहें।🙏🏻

रविवार, 3 मई 2020

विशेषज्ञ

🙏🏻📚

*विशेषज्ञ*

विशेषज्ञ हूँ,

तीन भुजाएँ खींचता हूँ

तीन कोण बनाता हूँ,

तब त्रिभुज नाम दे पाता हूँ..,

तुम क्या करते हो कविवर?

विशेष कुछ नहीं

बस, त्रिभुज में

चौथा कोण देख पाता हूँ..!

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

अपराह्न 1:15 बजे
2.5.2020

🙏🏻✍️

शनिवार, 2 मई 2020

सत्य


🌱

*सत्य*

परम सत्य,
शाश्वत सत्य,
अंतिम सत्य,
अपना पांडित्य
अपने को छलता रहा,
बिना किसी विशेषण के
सत्य अपनी राह चलता रहा।

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

रात्रि 1.43 बजे, 29.4.2020

# कृपया घर में रहें। सुरक्षित रहें।

✍️🙏🏻

शुक्रवार, 1 मई 2020

निश्चय


📚🌷

*निश्चय*

उसे ऊँची कूद में भाग लेना था पर परिस्थितियों ने लम्बी छलांग की कतार में लगा दिया। लम्बी छलांग का इच्छुक भाला फेंक रहा था। भालाफेंक को जीवन माननेवाला सौ मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था। सौ मीटर का धावक, तीरंदाजी में हाथ आजमा रहा था। आँखों में तीरंदाजी के स्वप्न संजोने वाला तैराकी में उतरा हुआ था। तैरने में मछली-सा निपुण मैराथन दौड़ रहा था।

जीवन के ओलिम्पिक में खिलाड़ियों की भरमार है पर उत्कर्ष तक पहुँचने वालों की संख्या नगण्य है। मैदान यहीं, खेल यहीं, खिलाड़ी यहीं  दर्शक यहीं पर मैदान मानो निष्प्राण है।

एकाएक मैराथन वाला सारे बंधन तोड़कर तैरने लगा। तैराक की आँंख में अर्जुन उतर आया, तीर साधने लगा। तीरंदाज के पैर हवा से बातें करने लगे। धावक अब तक जितना दौड़ा नहीं था उससे अधिक दूरी तक भाला फेंकने‌ लगा। भालाफेंक का मारा भाला को पटक कर लम्बी छलांग लगाने लगा। लम्बी छलांग‌ वाला बुलंद हौसले से ऊँचा और ऊँचा, बहुत ऊँचा कूदने लगा।

दर्शकों के उत्साह से मैदान गुंजायमान हो उठा। उदासीनता की जगह उत्साह का सागर उमड़ने लगा। वही मैदान, वही खेल, वे ही दर्शक पर खिलाड़ी क्या बदले, मैदान में प्राण लौट आए।

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

अपराह्न 12:55 बजे, 30.4.2020

(आगामी लघुकथा संग्रह से।)

# वैश्विक महामारी से लड़ने में सरकार का साथ दें। घर में रहें। आपका दिन सार्थक हो।

🙏🏻✍️