शनिवार, 2 मई 2020

सत्य


🌱

*सत्य*

परम सत्य,
शाश्वत सत्य,
अंतिम सत्य,
अपना पांडित्य
अपने को छलता रहा,
बिना किसी विशेषण के
सत्य अपनी राह चलता रहा।

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

रात्रि 1.43 बजे, 29.4.2020

# कृपया घर में रहें। सुरक्षित रहें।

✍️🙏🏻

शुक्रवार, 1 मई 2020

निश्चय


📚🌷

*निश्चय*

उसे ऊँची कूद में भाग लेना था पर परिस्थितियों ने लम्बी छलांग की कतार में लगा दिया। लम्बी छलांग का इच्छुक भाला फेंक रहा था। भालाफेंक को जीवन माननेवाला सौ मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था। सौ मीटर का धावक, तीरंदाजी में हाथ आजमा रहा था। आँखों में तीरंदाजी के स्वप्न संजोने वाला तैराकी में उतरा हुआ था। तैरने में मछली-सा निपुण मैराथन दौड़ रहा था।

जीवन के ओलिम्पिक में खिलाड़ियों की भरमार है पर उत्कर्ष तक पहुँचने वालों की संख्या नगण्य है। मैदान यहीं, खेल यहीं, खिलाड़ी यहीं  दर्शक यहीं पर मैदान मानो निष्प्राण है।

एकाएक मैराथन वाला सारे बंधन तोड़कर तैरने लगा। तैराक की आँंख में अर्जुन उतर आया, तीर साधने लगा। तीरंदाज के पैर हवा से बातें करने लगे। धावक अब तक जितना दौड़ा नहीं था उससे अधिक दूरी तक भाला फेंकने‌ लगा। भालाफेंक का मारा भाला को पटक कर लम्बी छलांग लगाने लगा। लम्बी छलांग‌ वाला बुलंद हौसले से ऊँचा और ऊँचा, बहुत ऊँचा कूदने लगा।

दर्शकों के उत्साह से मैदान गुंजायमान हो उठा। उदासीनता की जगह उत्साह का सागर उमड़ने लगा। वही मैदान, वही खेल, वे ही दर्शक पर खिलाड़ी क्या बदले, मैदान में प्राण लौट आए।

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

अपराह्न 12:55 बजे, 30.4.2020

(आगामी लघुकथा संग्रह से।)

# वैश्विक महामारी से लड़ने में सरकार का साथ दें। घर में रहें। आपका दिन सार्थक हो।

🙏🏻✍️

सूत्र


*सूत्र*

उदासीन हो

उदासीनता बयान करो,

इस विषय पर

एक रचना हो सकती है,

कुछ नहीं लिखता

यह सोच कर, जो

सूत्र, सूक्ति ना दे पाठक को

भला कविता कैसे हो सकती है?

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

प्रातः 10:19 बजे,
19 अप्रैल 2020

# घर में रहें। सुरक्षित व स्वस्थ रहें।

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

शपथ


📚🍁
*शपथ*
जब भी
उबारता हूँ उन्हें,
कसकर पकड़ लेते हैं
अंग-अंग  जकड़ लेते हैं,
मिलकर डुबोने लगते हैं मुझे,
सुनो...!
डूब भी गया मैं तो
मुझे यों श्रद्धांजलि देना,
मिलकर, डूबतों को
उबारने की शपथ लेना..!
संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com
🙏🏻✍️

गाथा



*गाथा*

वास्तविकता,
काल्पनिकता,
एक सौ अस्सी अंश
दर्शाती भूमिकाएँ,
तीन सौ साठ अंश पर
परिभ्रमण करती
जीवनचक्र की
असंख्य तूलिकाएँ,
आदि की भोर,
अंत की सांझ,
साझा होकर
अनंत हो रही हैं,
देखो मनुज,
दंतकथाएँ, अब
सत्यकथाओं में
परिवर्तित हो रही हैं..!

संजय भारद्वाज
writersanjay@gmail.com

रात्रि 11.49 बजे,
28.4.2020

# सुरक्षित रहना है, घर में रहना है।


सोमवार, 27 अप्रैल 2020

संजय


📚🍁

*संजय*

सारी टंकार
सारे कोदंड
डिगा नहीं पा रहे,
जीवन के महाभारत का
दर्शन कर रहा हूँ,
घटनाओं का
वर्णन कर रहा हूँ,
योगेश्वर उवाच
श्रवण कर रहा हूँ,
'संजय' होने का
निर्वहन कर रहा हूँ!

संजय भारद्धाज
writersanjay@gmail.com

रात्रि 9:14 बजे, 3अक्टूबर 2015

# घर में रहें, स्वस्थ व सुरक्षित रहें।

✍️🙏🏻

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020


💥💥

बच्चों को उठाने के लिए माँ-बाप अलार्म लगाकर सोते हैं। जल्दी उठकर बच्चों को उठाते हैं। किसीको स्कूल जाना है, किसीको कॉलेज, किसीको नौकरी पर। किसी दिन दो-चार मिनट पहले उठा दिया तो बच्चे चिड़चिड़ाते हैं।  माँ-बाप मुस्कराते हैं, बचपना है, धीरे-धीरे समझेंगे।...धीरे-धीरे बच्चे ऊँचे उठते जाते हैं और खुद को 'सेल्फमेड' घोषित कर देते हैं।
सोचता हूँ कि माँ-बाप और परमात्मा में कितना साम्य है! जीवन में हर चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए जागृत और प्रवृत्त करता है ईश्वर। माँ-बाप की तरह हर बार जगाता, चाय पिलाता, नाश्ता कराता, टिफिन देता, चुनौती फ़तह कर लौटने की राह देखता है। हम फ़तह करते हैं चुनौतियाँ और खुद को 'सेल्फमेड' घोषित कर देते हैं।
कब समझेंगे हम? अनादिकाल से चला आ रहा बचपना आख़िर कब समाप्त होगा?

संजय भारद्धाज
writersanjay@gmail.com

*# निठल्ला चिंतन*

( प्रातः 6:52 बजे,28.8.19)

घर पर रहें, स्वस्थ रहें।

📚✍🙏🏻